भगवद्गीता से कैसे बदलेगा हमारा जीवन ?

श्रीमद् भगवद्गीता के अनेको पहलुओं में से कभी माता की तरह ममत्व देती है, कभी पिता के समान डाटती है, कभी मित्रों के तरह सलाह देती है तो कभी भाई के जैसे समझ दिलाती है | गीता में जो मैनेजमेंट का रहस्य बताया है, वो आज हमारे इस विज्ञानी तकनीक और लाइफस्टाइल को ओर अच्छे से प्रगत, नाविन्यपूर्ण बनाने में सहायता करता है | जैसे गीता का चौथा अध्याय में बताया है – अर्जुन पूछते हैं, क्या इससे पहले यह ज्ञान किसी और को मिला है? तो हां ये सच है यह ज्ञान अर्जुन से पहले भगवान सूर्यदेव और उनके पुत्रों को मिला किन्तु कुछ समय पश्चात ये लोप हो गया | तो इसे फिर से भगवान कृष्ण ने अर्जुन के लिए उजागर किया |

भगवद्गीता का उदय तो युद्ध के मध्य में हुआ है | यहाँ हर समय कभी बाहर तो कभी भीतर युद्ध चल रहा है | कृष्ण माने क्या, जो कर्म को कुशलता पूर्वक करते है | अपने कर्म को कुशलता पूर्वक करनेवाले हर एक व्यक्ति युद्ध के बीच ज्ञान को धारण करता है | गीता का सांख्य योग यही बताता है जिसने ज्ञान को अपनाया उसमें अपने इन्द्रियोंको समझने की शक्ति है और जो इन्द्रियोंको समझता है वही निर्णयात्मक शक्ति से परिपूर्ण होता है और कोई भी व्यवस्था की शुरुवात – मैनेजमेंट का बेस ही योग्य निर्णयात्मकता पर आधारित है | योग्य निर्णय वही है जो थोड़े समय के लिए दुःख दे और लम्बे समय के लिए हित में है | जब अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहते थे, तब भगवान कृष्ण ने समझाया की अगर युद्ध करने से शांति हो तो युद्ध करना चाहिए |

श्रीमद् भगवद्गीता ने और एक महत्वपूर्ण बात बताई है की कोई बाहर से आकर हमारे भीतर परिवर्तन नहीं ला सकता, खुद का विकास हमें खुद करना पड़ेगा | किसी भी मैनेजमेंट में अगर मुखिया को किसी एक के प्रति लगाव या लोभ हो तो उसके दुर्गुण भी स्वीकार कर लेते है और किसी के प्रति राग या द्वेष हो तो उसके सद्गुण भी दिखाई नहीं देते | यह स्थिति युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन की थी, इसलिए भगवान कृष्ण ने अपने रथ को कुरुक्षेत्र के मध्य में लाया माने अर्जुन की  दृष्टि को एक ही स्थिति हो – सुख दुःख समै कृत्वा लाभा लाभो जया जयो |

श्रीमद् भगवद्गीता में हम देखते है अर्जुन उवाच, श्रीभगवानुवाच, संजय उवाच – उवाच माने केवल उन्होंने ऐसा कहा यह नहीं है | एक गहन दृष्टि से देखते है तो हम समझ पाएँगे, जब कोई कहता है की सुनो तो हम अपना पूर्ण ध्यान उस बात पर ले जाते है | हमें भी अपने जीवन में केंद्र जाकर देखना चाहिए जैसे कोई मूर्तिकार अपनी कला को साकार कर थोडा रूककर देखता है क्या मेरी आकृति ठीक से बन रही है ? वैसे ही क्या मेरा जीवन सही दिशा से जा रहा है ? मेरी चाह मेरी राह की ओर तो है न?

कहते है की गायन्ति इति स गीता – जिसे गाया गया है वही गीता है | ये बड़ी अजब बात है, इधर युद्ध की भूमिका है, कुरुक्षेत्र के भूमि है लेकिन गान तो संस्कृति का हो रहा है | जो व्यक्ति परिपक्व है वो अपने मूल को नहीं छोड़ता | कृष्ण का तो मूल स्वभाव ही है आनंद – अपनी भूमिका को निभाते हुए कृष्ण ने संस्कृति का गान किया | आखिर संस्कार और संस्कृति पर ही किसी भी देश की नीव बनी है | तो एक अच्छा लीडर अगर अपने संस्कारों को संस्कृति की ओर बढ़ाये तो देश उनके साथ है | आखिर सबको प्रगतशील बनना प्रिय है और गीता एक ऐसी विजयरथ की गाथा है जिसका एक पहिया शौर्य है, दूसरा धैर्य है और ध्वजा प्रेम है, जिसे ध्यानयोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की शक्ति से खीच रहे है |

मन की प्रसन्नता ही ज्ञान का लक्षण है और लक्ष्य भी | श्रीमद् भगवद्गीता ने यही लक्षण और लक्ष्य को स्पष्ट किया है | अगर देखा जाये तो लोग बुरे नहीं है, बस बीमार है – मन से | और एक ज्ञानी व्यक्ति निंदा नहीं करता बल्कि डॉक्टर की तरह निदान करता है | वो अपना समय निंदा में नहीं, निदान में व्यतीत करता है | जरुरत पड़े तो ऐसे लोगों को आइना दिखाकर अंतर्मुख भी करता है | भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यही समझाया की भाई देखो दुर्योधन तो बीमार है, अब तुम तय कर लो की भागना है की सामना करना है? और जरुरत पड़ने पर भीष्म को भी आइना दिखाया- पाप को देखने वाला भी तो पापी ही है| गलती हो तो स्वीकार करो और अन्याय हो तो सामना करो | साधन कोई भी हो, अंतकरण में समदर्शिता होने से कर्म फल से मुक्ति मिल सकती है |

श्रीमद् भगवद्गीता के नौवे अध्यायानुसार कृष्ण कहते है – अर्जुन मुझे बड़ा दुःख होता है जब कोई अपने मनुष्य के शरीर मिलने पर भी इसका मोल नहीं समझ पातें | यह शरीर जो एक दिन प्रकृति द्वारा नष्ट होने वाला तो है ही, लेकिन उससे पूर्व कुछ अच्छे कर्म को निभाओ | माने अपना शरीर और मन कुछ नए सृजनात्मक कार्यों में लगे | इस सृष्टि का सृजन रज, तम और सत्व से हुआ है | ये तीनों गुण परस्पर विरोधी तो है लेकिन सृजन के लिए तीनों आवश्यक है | जैसे एक दिया तेल, बाती, मिट्टी और अग्नि से बना है – तेल द्रव, बाती और मिट्टी स्थूल है, तत्व परस्पर विरोधी होकर भी प्रकाश मिल रहा है | ऐसे ही हम जहाँ रहते है वहां भिन्न भिन्न प्रवृत्ति के लोग है, किन्तु उनकी उर्जा का प्रयोग ठीक से हो, तो व्यवस्था परिवर्तन ( मैनेजमेंट ) में शिकायतों से बच सकते है | जैसेः बाती है पर तेल नहीं बचा तो भी दिया टीक नहीं पायेगा, यही तो कला है किसे कैसे बनाये रखे |

जो सत्य के मार्ग पर चलता है, हो सकता है की उसका विरोध हो और इसकी शुरुवात तो अपने ही घर से होती है | ये केवल द्रौपदी के अपमान से छेड़ा हुआ रणसंग्राम नहीं है, ये तो अन्याय-अधर्म-अनीति के खिलाफ मन में उठा द्वंद्व है, जिसका सामना आज भी हमें करना पड़ रहा है | इसका कारण हम आज की हमारी जीवनशैली को देखे तो मैं और मेरा यही तक सीमित है किन्तु ऐसे भी कई प्रश्न है जैसे आप खुश है लेकिन परिवार के लोग दुखी और बीमार है, कई गावों में मुलभुत सुविधाओं की कमी है, देश आतंकवाद से झुंझ रहा है, क्या ऐसे देश-समाज में हम खुश रह पाएँगे? नहीं ना, तो अप्रत्यक्ष रूप से आपकी ख़ुशी दुसरों पर और दूसरों की ख़ुशी आप पर निर्धारित है | श्रीमद् भगवद्गीता में यही कहा है की मनुष्य मात्र का उद्धार उसकी अभिरुचि,योग्यता और श्रध्दा यही तीन साधन से होती है जिसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग कहा गया है | हम अपने कर्मफल से नहीं बच सकते, चाहे वो गलती से भी हो जाये | अग्नि पर पैर पड़े तो वो अपना काम करेगी ही | तो अगर हम कर्म के फल से नहीं बच सकते तो क्या हमें बार बार प्रत्येक कर्म के फल को भोगना ही पड़ेगा ? ये सवाल मन में आए तो आगे कहा है की श्रद्धा रखो | कर्म करने के बाद मुझे ख़ुशी मिलेगी ये न सोचकर खुश होकर और दुसरों को ख़ुशी बाटकर कर्म करोगे तो वही कर्मयोग कहलाएगा – यह अनमोल ज्ञान कृष्ण ने कोई अध्यापक बनकर नहीं, बल्कि मित्र बनकर अर्जुन को और आज हमें भी दिया है | और फिर भी द्वंद्व है तो अंत में कहते है – सर्व धर्मान परित्यज मामेकं शरणम् व्रज | मुझमे शरण हो जाओ |

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