शिव और कृष्ण एक ही है

अनन्त के विविध गुण हैं और विशेष गुणों के अनुसार वे नाम ग्रहण करते हैं । उन्हें देवता कहते हैं ।

देवता तो सिर्फ तुम्हारी ही परम-आत्मा की किरणें है, तुम्हारे विस्तृत हाथ । वे तुम्हारी ही सेवा में रहते हैं – जब तुम केंद्रित होते हो । जैसे एक अंकुरित बीज से जड़, स्कन्ध व पत्तियाँ निकलती हैं, वैसे ही जब तुम केंद्रित होते हो, तब तुम्हारे जीवन में सभी देवी-देवताओं का प्रकटिकरण होता है ।

जिस तरह सूर्य के उज्ज्वल प्रकाश में सभी रंग समाये रहते हैं, उसी तरह सभी देवता तुम्हारी विशुद्ध आत्मा में समाये हैं । परम- सुख उनकी श्वास है, वैराग्य उनका वास ।

देवता तुम्हारी संगत में बहुत आनंदित होते हैं पर तुम्हें उनसे कोई लाभ नहीं । वे केवल उन्ही के समीप रहते हैं जिनको उनसे कोई लाभ नहीं ।

वैराग्य के दाता हैं शिव – वह परम चेतना जिसमें भोलापन है, जो आनंदमय है, सर्वव्यापी है । कृष्ण शिव की बाह्य अभिव्यक्ति है और शिव कृष्ण का आतंरिक मौन ।

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