जीवन परिचय – हिन्दी

देवी वैभवीश्रीजी : दिल को छूने वाले भाव एवं भक्ति की संवाहिका

भारत भूमि पर अनेकानेक संतो, गुरुओं, मार्गदर्शकों, उपदेशकों, चिंतकों व दार्शनिकों का अवतरण निरंतर होता रहा है, जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से स्वकल्याण के साथ-साथ परकल्याण, परोपकार एवं परमार्थ के अनेक अनूठे एवं विलक्षण कार्य किये। भारतवर्ष की परम्परा भागवत भक्तों की है। कहते है, लाखों व्यक्तियों में से कोई एक वक्ता बनता है। जिनका वक्तव्य अनेक लोगों के चित्त को शुद्ध करता है, खुशी प्रदान करता है, और उनके जीवन की दिशा ही बदल देता है। उनके हृदय में जरूर गोविन्द विराजमान होते हैं तभी उनकी वाणी चमत्कार घटित करते हुए लोगों को न केवल आनन्द प्रदान करती है बल्कि उनके दुःख, तकलीफ, संताप एवं पीड़ाओं को भी दूर कर देती है। ऐसी ही एक अनूठी एवं विलक्षण आध्यात्मिक प्रवक्ता, साधिका, समाजसेविका एवं जीवननिर्मात्री हैं – देवी वैभवीश्रीजी


बचपन :

पूज्या देवी वैभवीश्रीजी का जन्म 16 अक्तूबर 1991 को, देवी नवरात्रि के नवम तिथि के पावन दिन महाराष्ट्र के अमरावती शहर में हुआ। बचपन में ही आपके मुखमंडल का तेज और आभा देखकर अनेक संतों ने भविष्यवाणी की कि इस बालिका ने एक विशेष आध्यात्मिक कार्य करने हेतु जन्म लिया है। आपको बाल्यावस्था में ही अनेक संतों और महात्माओं के मार्गदर्शन के साथ-साथ अपने दादाजी और पिताजी का विशेष अनुग्रह एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। आपने आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ  8 साल की छोटी- सी उम्र में ही कीर्तन एवं प्रवचन और 13 साल की उम्र में श्रीमद् भागवत और तुलसी रामायण पर कथावाचन करना प्रारंभ किया। आपका संपूर्ण जीवन भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण की भक्ति एवं साधना से ओत-प्रोत है।


जीवन तत्त्व और मार्गदर्शन :

2008 में जब पहली बार आपकी मुलाकात गुरुदेव श्री श्री रविशंकरजी के साथ हुई, तब उन्होंने आपको कथा के साथ-साथ प्राणायाम, ध्यान एवं मंत्रोच्चार सिखाने के हेतु प्रोत्साहित किया और कहा- “कथा प्रवक्ता तो बहुत हैं किन्तु आज लोगों को केवल शब्दों की नहीं, बल्कि अनुभव करवाने की जरूरत है। कथा के माध्यम से लोगों को सेवा के लिए प्रेरित कीजिये।” उनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शन का ही प्रभाव है कि आपने कथा के साथ-साथ ध्यान, साधना, मंत्र के विशेष अनुष्ठान करने में दक्षता एवं विशेषज्ञता अर्जित की है। आप योगी है, ज्ञानी है, त्यागी हैं, संयमी हैं, पराक्रमी हैं, ओजस्वी वक्ता हैं, गायिका हैं और अनुग्रही हैं जो आपके व्यक्तित्व को न केवल महिमामंडित करते हैं बल्कि आपकी संतता को प्रस्तुति देते हैं। आपने देश और दुनिया में जन-जन के मन को मोहने वाले बेहतरीन अंदाज, सारगर्भित भाषा, दिल को छूने वाले भाव एवं भक्ति संगीत में ईश्वर का गुणगान करने की क्षमता अर्जित की हैं। मानो उनके मुख से निकलने वाले शब्द अमृत बरसा कर रहे हो। वे जहां भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कारों की संवाहक बनी हुई हैं, वहीं समाज सुधारक एवं जनकल्याण की प्रेरक भी बनी हैं और मानवता को धन्य कर रही है|


2003 में हुआ इस यात्रा का आरम्भ :

पूज्या देवी वैभवीश्रीजी का मानना है कि कथा केवल पुराणों में घटीं घटनाओं का क्रम नहीं है। कथा तो निरंतर चल रही है। प्रह्लाद, शबरी, उद्धव, अर्जुन, हनुमान, गोपियां-ये केवल कोई व्यक्ति नहीं है, ये तो प्रवृत्ति है, भक्ति के लक्षण है , जीवन को प्रेरित करने की दिशाएं हैं। इसलिए आपकी कथावाचन के कार्यक्रम धार्मिक से ज्यादा आध्यात्मिक होते हैं। वे केवल उपदेश ही नहीं देती, बल्कि प्रायोगिक प्रशिक्षण भी प्रदान करती है। उनके अनमोल वचन आज आशीर्वाद के रूप में फलित हो रहे हैं और 2003 से आज 16 साल पूर्ण होने तक आपने महाराष्ट्र के लगभग सभी शहरों और अनेक राज्यों में मराठी एवं हिंदी परंपरा से श्रीमद् भागवत, देवी भागवतम, तुलसी रामायण, शिव महापुराण, भगवद्गीता, श्री गुरु गीता आदि कथाओं से आध्यात्मिक प्रवचनों के द्वारा दिनोंदिन जीवन उन्नत एवं आदर्श बनाने के सूत्रों को बड़ी सरलता, सहजता से बतलाया है। लाखों लोगों ने आपकी सुमधुर वाणी और रसमय गान से लाभान्वित होकर अपने जीवन में आनंद, उल्लास और परम शांति की अनुभूति की है | 
देवी वैभवीश्रीजी की नेतृत्व एवं आध्यात्मिक क्षमताएं कितनी नैसर्गिक हैं और कितनी अर्जित, कहना कठिन है। पर यह निश्चित है कि आपके पास विविध विषयों का अखूट ज्ञान भंडार है। आपकी वाणी एवं लेखनी में ताकत हैं। प्रशासनिक क्षमता है। आपके नेतृत्व का प्रबल शक्तिपूंज है चारित्रिक दृढ़ता। सही एवं पवित्र आध्यात्मिक नेतृत्व बहुत बड़ी तपस्या है। कहते हैं कि सिद्ध पुरुष अनेक हो सकते हैं, उनकी प्राप्ति अपेक्षाकृत सरल है। सद्गुरु विरल होते हैं। सिद्ध वह है, जो सत्य को उपलब्ध हो गया। पूज्य देवी वैभवीश्रीजी ऐसे मार्गदर्शक हैं, जो जन-जन के जीवन में व्याप्त अंधकार को दूर कर जीवन के वास्तविक अर्थ से परिचित करा रही हैं। उनका चिन्तन का निष्कर्ष है कि कहीं जीवन मूल्यों की अक्षय परम्परा रूढ़ता का बाना पहनकर सिर्फ भीड़ का हिस्सा बनकर न रह जाये। इसलिये वे चाहती है कि कर्म का जागता हर क्षण कृतज्ञता एवं पुरुषार्थ का संवाहक बने, क्योंकि ऐसा जीवन स्वयं एक सार्थकता है, एक प्रेरणा है।

देवी वैभवीश्रीजी की सहज-सरल शैली, मधुर वाणी, गम्भीर चिंतन, सरलतम स्वभाव, तेजस्वी दर्शन एवं प्रत्येक शास्त्रीय सूत्रों को वर्तमान जीवन-व्यवहार से जोड़कर निष्कर्ष देने की वक्तव्य कला कथाओं को और भी प्रभावशाली रूप से जन-मानस के हृदय पटल पर अंकित कर देती है। कथाओं में भक्ति भावमय भजनों के माध्यम से आप श्रोताओं को भगवत् सान्निध्य एवं भगवत् कथा का साक्षात् अनुभव करा रही हैं। इन कथाओं के माध्यम से पूज्य देवीजी का प्रमुख उद्देश्य मानव जीवन को आनन्दमय, पवित्र एवं सदाचारमय बनाना है। गौरवशाली सर्वाधिक प्राचीन सनातन-संस्कृति के महत्व से विश्व को पुनः परिचित कराना है। विलक्षण प्रतिभा की धनी आपश्री चलता-फिरता भारतीय आध्यात्मिकता एवं हिन्दू धर्म-संस्कृति का विश्वकोष हैं। उनकी अद्भुत प्रतिभा, अद्वितीय स्मरण शक्ति और उत्कृष्ट भक्ति जन-जन को प्रेरित करती है । वे अदम्य उत्साह, सरलता, सादगी और शौर्य की धनी हैं। जीवन के अथ से इति तक, उनमें रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता के दर्शन होते हैं।


सेवाकार्य :

देवी वैभवीश्रीजी की कथा-प्रवचनों के माध्यम से सेवा एवं परोपकार के अनूठे कार्यों को सम्पादित कर रही हैं। सत्संग के माध्यम से समाज के संतप्त लोगों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव करा रही है। आपका पूर्ण समय भगवत सेवा, संत सेवा, भजन-कीर्तन, सत्साहित्य का स्वाध्याय एवं लेखन कार्यों के साथ-साथ जीवदया के कार्यों में व्यतीत होता है, आपके नेतृत्व में अनेक सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं, जिनके अंतर्गत प्रतिदिन साधु संतों एवं गरीब लोगों की सेवा, गरीब छात्र-छात्राओं को शिक्षार्थ आवश्यक अनुदान देना, गरीब कन्याओ का विवाह, वृद्ध एवं बीमार गरीब लोगों को चिकित्सा सेवा प्रदान करना, स्वास्थ्य सेवाएं इत्यादि शामिल है। वर्तमान में गौ माता की अत्यन्त दयनीय स्थिति एवं देश में हो रही गौ वध की घटनाओं से अत्यंत क्षुब्ध होकर सर्वदेवमयी गौमाता को बचाने के लिए देवी वैभवीश्रीजी गौ-सेवा के लिये अनेक प्रकार से सक्रिय हैं| पवित्र गाय की रक्षा करने और बचाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना, गायों को बूचड़खाने में मारे जाने से बचाना और उन्हें फिर से पुनर्वास करने के लिए प्रोत्साहित करना। गाय के दूध, मक्खन, दही और घी और शाकाहारी होने के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना। देवी वैभवीश्रीजी की कथा वाचन, समाजसेवा, गौ-कल्याण एवं बालिका उत्थान की उपलब्धियां भारतीय संस्कृति, भक्ति, जनकल्याण एवं अध्यात्म को नए शिखर प्रदत्त कर रही हैं।


पुरस्कार एवं सम्मान :

देवी वैभवीश्रीजी को उनकी अनूठी आध्यात्मिकता एवं सामाजिकता के लिये अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए हैं। हाल ही में 20 जनवरी 2019, MIT वर्ल्ड पीस युनिवर्सिटी कॅम्पस, पुणे में भारतीय छात्र संसद फाऊंडेशन ने अपने 9 वें भारतीय छात्र संसद समारोह में देवी वैभवीश्रीजी को ‘युवा आध्यात्मिक गुरू पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। फरवरी 2019 में आपको ‘संत सेवाश्री सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया है। वे इन पुरस्कारों से बहुत ऊपर हैं। ‘नेकी कर दरिया में डाल’ के ध्येय को जन-जन में स्थापित करने के लिये वे तत्पर हैं। उनके मन में सबके प्रति कल्याण के भाव है, उनकी विकास यात्रा में सबके अभ्युदय की अभीप्सा एवं स्वयं की करुणा में सबके साथ सह-अस्तित्व का भाव हैं।


साभार : श्रीमान ललित गर्ग द्वारा नैशनल मैगज़ीन “उदय इंडिया (हिन्दी)” के ‘संतदर्शन’ पेज़ में प्रकाशित लेख
लिंक : http://bit.ly/2lQ2nua

 

 

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