Deepavali – festival of lights

Originating from the Sanskrit word ‘Deepavali’, it literally means rows (Avali) of lights (Deepa). This festival of lights is celebrated on the darkest night (Amavasya) of Kartik month in the Indian calendar, and it symbolizes the vanquishing of ignorance (darkness) by the knowledge (light).

Whatever negativity – anger, jealousy or fear, has been accumulated in your mind in the last one year should get blasted in the form of all the crackers. With each cracker, burst any negativity you may have for any person, or at the most write name of that person on the cracker and burst it, and just know that all ill feelings, jealousy etc, has got burnt. But what do we do? Instead of finishing the negativity, either we wish that person to get finished or burn ourselves in that fire of negativity. It should be the other way around. Thinking all the negativity or ill feelings have gone out with those crackers, become friendly with that person again. There is a feeling of lightness, love, peace and happiness, and then go and have sweets with that person and celebrate Diwali. This is only true Diwali, by bursting crackers burn the bad qualities of that person NOT the person!

On the day people perform devotional practices and puja in honour of various Divine energies, esp, Goddess Laxmi – The Goddess of Wealth. Having significance in victory of good over evil in many Eastern religions, the lamps are lit at night. Also at some places the belief goes that lamps are lit all night in reverence to the Lord Yama – the God of Death and hence also known as ‘Yamadeepdaan’. This is supposed to take away the fear of an untimely death.

On this very auspicious day, many saints and great people have taken Samadhi and left their mortal bodies. The great seers include Lord Krishna and Bhagwan Mahavir. This is also the very day when Lord Rama returned home with Sita and Lakshman after 14 years in exile. On this day the Sikhs commemorate the return of the Sri Guru Gobind Singh from captivity in the Gwalior Fort.

One very interesting story about this time of the year is from Kathopanishad of a small boy called Nachiketa who believed that Yama, the god of Death was as black as the dark night of Amavasya. But when he met the Yama in person, he was puzzled seeing Yama’s calm countenance and dignified stature. Yama explained to Nachiketa that only by passing through the darkness of death, man sees the light of the highest wisdom and his soul can escape from the bondage of his body to become one with the Divine. Nachiketa, then, realized the importance of worldly life and significance of death. With all his doubts set at rest, he whole-heartedly participated in the Diwali celebrations.

Hence various glorious events in different ages have taken place at this time of the year.

This Diwali let us pray and feel grateful – let there be prosperity in every corner of the world – let all people experience love, joy and abundance in their lives.

Does the planet Saturn affect people’s lives?

If you are undergoing a particular Saturn period, the period is going to affect you and your mind. However, does Saturn always affect us in a bad way? No! Don’t think that the Saturn period is always bad.

Saturn is a very spiritual planet.

If you are on the spiritual path, he (Saturn) can be good for you, he will elevate your life. If you have dispassion, he will help you more. If you are not on the spiritual path, he will create a problem so that you get on the spiritual path.

If you are caught up in the worldly life, he will trouble you so you get out of there and find the bigger wealth inside you.

If you are too attached to something, Saturn will try to remove that attachment and push you. This is what happens to most people: they lose their job, relationship, reputation, they lose everything. Then they start searching, trying to figure out where to go? And then they come to the spiritual path!
So, Saturn will either give you inner wealth or outer wealth. If you are stuck to the outer wealth, he will push towards inner wealth. If you have inner wealth, he will give you outer wealth. He will give you more things outside.

Saturn takes 30 years to take one circle around the Sun, so it stays for around 2.5 years in each constellation or zodiac sign. The period can extend up to 5 years or 7.5 years. This is why people feel so desperate; they have a problem with their relationship, money, job, all sorts of problems for 2.5 years to 7.5 years.

A Saturn period comes only twice in a lifetime, not more; maximum twice. It comes once in 30 years, so two times for 7 years. When it comes the second time, it is not that severe. One finds it very severe the first time, you feel so bad and the mind goes down, nothing feels right. This is when Jyotishi (astrology) comes to help. If you know that you are going through a particular period, then you wait for time to pass. You turn spiritual, you do more meditation, and all the practices that uplift you, elevate you, pull you through that tough period.
Again, it need not be bad for everybody. If you are already well established in the path, then it can give you lot of success also.

देवी शक्ति के तीन प्रमुख रूप

जिस ऊर्जा से दूर से दिखनेवाले बृहदाकार और तेजस्वी तारे, ग्रह वैसे ही सूक्ष्म मानवी मन का और उसके अंतर्गत आने वाले भावनाओं का जनम हुआ वह ऊर्जा ही साक्षात् ‘देवी’ है। जिसे शक्ती मतलब ऊर्जा इस नाम से जाना जाता है। वही शक्ती समस्त ब्रम्हांड को निरन्तर कार्यरत रखने के लिए कारणीभूत है।

नवरात्रि में, इस ऊर्जा की विभिन्न नामों और रूपों में पूजा की जाती है।

“दिव्यता व्यापक है लेकिन वह सुप्त है। पूजा और आराधना द्वारा उसे जगाया जाता  हैं। “

देवी मां या शक्ति के तीन प्रमुख रूप हैं:

  • दुर्गा देवी : सुरक्षा की देवता
  • लक्ष्मी देवी: ऐश्वर्य की देवता
  • सरस्वती देवी: ज्ञान की देवता

दुर्गा देवी :

नवरात्रि के पहले तीन दिन (१, २ और ३ ) देवी की पूजा ‘दुर्गा’ के रूप में करते हैं। दुर्गा के सानिध्य में नकारात्मक शक्तियां नष्ट हो जाती है। दुर्गा देवी नकारात्मकता को सकारात्मकता में परावर्तीत करती है।

दुर्गा देवी को ‘जय दुर्गा’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि वह विजय दिलाती है। उसकी कुछ विशेषताएं-

  • लाल रंग : दुर्गा देवी लाल रंग से सम्बंधित है। लाल साडी. लाल रंग चैतन्य का प्रतीक है।
  • नवदुर्गा : यह दुर्गा शक्ति के नौ अलग-अलग रूप हैं जो सभी नकारात्मकता से रक्षा के लिए एक कवच जैसा कार्य करते हैं। देवी के इन गुणों के स्मरण मात्र से ही मन से नकारात्मकता नष्ट हो जाती हैं। देवी के नाम के उच्चारण से ही हमारी चेतना के स्तर में वृद्धि होती हैं और यह हमें आत्म-केंद्रित, निर्भय और शांत बनाते हैं। जिन लोगों में चिंता, भय और आत्मविश्वास की कमी हैं, उनके लिए यह नामोच्चार बहुत लाभदायक होता है।
  • महिषासुर मर्दिनी : महिषासुर मर्दिनी के रूप में दुर्गा देवी महिष का विनाश करती है। महिष का अर्थ है भैंस जो निष्क्रिय, आलसी और जडत्व का प्रतिक है। ये गुण आपके शारीरिक और आध्यात्मिक जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं। देवी सकारात्मक ऊर्जा से भरी हुई है, जो आलस्य, थकावट और जड़ता का विनाश करती है।

माता लक्ष्मी :

नवरात्रि के अगले तीन दिनों में (४, ५ और ६) देवी की पूजा लक्ष्मी के रुप में की जाती है। लक्ष्मी संपत्ती और समृद्धि की देवता है। हमारे जीवन की उन्नति और प्रगति के लिए संपत्ती की आवश्यकता है। संपत्ती का अर्थ केवल धन नहीं बल्कि ज्ञान आधारित कला और कौशल की प्राप्ति भी है। लक्ष्मी देवी मनुष्यों की भौतिक और आध्यात्मिक प्रगति की आवश्यकता प्रतिक है। मानव जाती के सर्वांगीण प्रगति हेतु भौतिक और आध्यात्मिक जरूरतों के पूर्ति का प्रतिक माता लक्ष्मी है।

इस देवी शक्ति के आठ रूपों की हम पर बौछार हो

  • आदि लक्ष्मी – यह रूप आपके मूल स्रोत का स्मरण कराती है। जब हम भूल जाते हैं कि हम इस ब्रह्मांड का हिस्सा है, तो हम खुद को छोटे और असुरक्षित मानते हैं। आदि लक्ष्मी यह रूप आपको अपने मूल स्रोत से जोड़ता है, जिससे अपने मन में सामर्थ्य और शांति का उदय होता है।
  • धन लक्ष्मी – यह भौतिक समृद्धि का एक रूप है।
  • विद्या लक्ष्मी – यह ज्ञान, कला और कौशल का एक रूप है।
  • धान्य लक्ष्मी – अन्न-धान्य के रूप यह रूप प्रकट होता है।
  • संतान लक्ष्मी – यह रूप प्रजनन क्षमता और सृजनात्मकता के रूप में प्रकट होता है । जो लोग रचनात्मक और कलात्मक होते हैं, उनपर लक्ष्मी के ये रूप की कृपा होती है।
  • धैर्य लक्ष्मी – शौर्य और निर्भयता के रूप में प्रकट होती है।
  • विजय लक्ष्मी – जय, विजय के रूप में प्रकट होती है।
  • भाग्य लक्ष्मी – सौभाग्य और समृद्धि के रूप में प्रकट होती है।

ये तीन दिन देवी लक्ष्मी को समर्पित हैं। इन विभिन्न रूपों में देवी लक्ष्मी हम सब पर प्रसन्न रहे और हम पर संपत्ति और समृद्धि की बौछार करे यही प्रार्थना।

सरस्वती देवी :

नवरात्रि के अंतिम 3 दिन (७, ८ और ९) देवी सरस्वती को समर्पित हैं।

सरस्वती ज्ञान की देवता है जो हमें ‘आत्मज्ञान’ देती है। देवी सरस्वती के कई पहलू हैं जो बहुत महत्वपूर्ण हैं।

  • पाषाण – वह पाषाण पर बैठी है। ज्ञान जो एक पाषाण की तरह अचल और निश्चल है वह हमेशा आपका साथ देता है।
  • वीणा – देवी सरस्वती वीणा बजा रही है। वीणा यह तंतु वाद्य है, जिससे निकलती मधुर ध्वनि मनशांति देती है। इसी तरह आध्यात्मिक ज्ञान हमें विश्राम दिलाता है और जीवन को एक उत्सव बनाता है।
  • हंस – देवी सरस्वती का वाहन हंस हैं। यदि हंस को दूध और पानी का मिश्रण दिया जाता है, तो वह उसमेसे दूध पी लेता है। यह विवेक का प्रतिक है जो ये दर्शाता है की हमें जीवन में सकारात्मकता स्वीकारनी चाहिए और नकारात्मक को छोड़ देना चाहिए।
  • मोर – देवी के साथ मोर होता है। मोर नृत्य और आपके रंगीन पंख प्रदर्शित करता है। लेकिन यह हर समय नहीं होता। ये इस बात का प्रतीक है के ज्ञान का खुलासा /उपयोग उचित जगह पर और उचित समय पर किया जाना चाहिए।

देवी सरस्वती हमारी अपनी चेतना का स्वरुप है, जो विभिन्न बाते सीखने को उद्युक्त करती है। यह अज्ञान दूर करनेवाली ज्ञान और आध्यात्मिक प्रकाश का स्रोत है।

चैतन्याची देवता – गणपती

अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं । निरानंद मानंद मद्वैत पूर्णं ।

परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं । परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम ॥१॥

जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं । सुरादिं सुखादिं गुणॆशं गणॆशं ।

जगद्व्यापिनं विश्ववंद्यं सुरॆशं । परब्रह्मरूपं गणॆशं भजॆम ॥२॥

गुणातीतमानं चिदानंदरूपं । चिदाभासकं सर्वगं ध्यानगम्यं ।

मुनिध्यॆयमाकाशरूपं परॆशं । परब्रह्मरूपं गणॆशं भजॆम ॥३॥

साधनेच्या दृष्टीने गणपती हा मूलाधार चक्राचा अधिपती आहे. आदि शंकराचार्य यांनी केलेले गणपतीचे वर्णन हे अतिशय अद्भुत वर्णन आहे. आदि शंकराचार्य यांनी गणपतीच्या स्वरूपाचे जे वर्णन करताना परब्रह्माचे स्वरूप समोर ठेवले आहे.

अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं । निरानंद मानंद मद्वैत पूर्णं ।

परं निर्गुणं निर्विशेषं निरीहं । परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम ॥१॥

अजं निर्विकल्पं निराकारमेकं

म्हणजे गणपती कधी जन्माला आला नाही. तो अज आहे आणि निर्विकल्पं आहे. आणि निराकार आहे. त्याच्यातील चैतन्य एकच आहे जे सर्वव्यापी आहे. ही अनुभूती तेव्हाच येते जेव्हा मूलाधार चक्र जागृत होते. या चैतन्यशक्तीला गणपती मानले गेले आहे. गणपतीचे जे बाह्य रूप, ज्याला आपण ‘गजानना’ समजतो, त्याच्यामागे मोठे रहस्य दडलेले आहे. ज्ञानाचे, विद्येचे अधिपती आहे गणपती. आणि ज्ञान-विज्ञान तेव्हाच उमजते जेव्हा माणूस आंतरिकपणे जागृत होतो. जेव्हा जडत्व असते तेव्हा ज्ञानाचा, विद्येचा अभाव असतो आणि जीवनात चैतन्य किंवा कोणतीही प्रगती नसते. तर जर चैतन्याला जागृत करायचे असेल तर चैतन्याचे अधिदेव आहेत श्री गणेश यांची भक्ती केली पाहिजे. गणपतीला कोणी परके न समजता आपल्या आंतरिक शक्तीचे केंद्र मानले गेले आहे. आपल्या अंतर्मनात गणपतीची स्थापना करा. आपली जी सात चक्रे आहेत त्यातील सर्वात प्रथम चक्र आहे मूलाधारचक्र ज्याचा अधिपती आहे गणपती. त्यावर लक्ष केंद्रित करून ध्यान करण्याची एक प्रक्रिया, एक विधी आहे.

ध्यानं निर्विषय मन – ध्यान करताना मनात काही विषय नसतो – काही बाह्य विषय किंवा स्थूल विषय मनात नसतो. तेव्हा सूक्ष्मविषयाचे अवलोकन केले जाते. निराकार रूप आणि तरी सुद्धा साकार रूप असलेल्या गणेशाची प्रार्थना जी आदि शंकराचार्य यांनी केली ती अतिश्लाघनीय व अतिमधुर आहे. शंकराचार्य म्हणतात.

जे निराकारापर्यंत पोहोचू शकत ते गणेशाच्या साकाररूपाचा आधार घेत हळूहळू निराकारापर्यंत पोहोचू शकतात. जो साकाररुपी गणेश आहे, जो गजवदन आहे, त्याची पूजा करीत करीत निराकार परमात्म असलेल्या गणपतीपर्यंत पोहोचण्याची अद्भुत कला आपल्या भारतात आहे.

परब्रह्म रूपं गणेशं भजेम

अशा गणेशाचे पूजन करा जो सर्वव्यापी आहे.

जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं । सुरादिं सुखादिं गुणॆशं गणॆशं ।

जगद्व्यापिनं विश्ववंद्यं सुरॆशं । परब्रह्मरूपं गणॆशं भजॆम ॥२॥

जी चैतन्यशक्ती या समस्त संसाराचे मूळ कारण आहे, ज्यातून सर्वकाही निर्माण झाले आहे, ज्यामध्ये सर्वकाही टिकून आहे आणि ज्या शक्तीमध्येच सर्वकाही विलीन होणार आहे ती कारणरुपी शक्तीच परमात्मा, परब्रह्मस्वरूप श्री गणपती आहे.

जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं

या जगताच्या कारणाविषयी जाणून घेणे हेदेखील एक ज्ञान आहे. ते सूक्ष्म ज्ञानसुद्धा गणेश आहे. ज्ञातासुद्धा तोच आहे आणि ज्ञानसुद्धा तोच आहे. ज्ञाता, ज्ञान आणि ज्ञेय हे तीन भाग असतात. आपण गणपतीची ज्ञेय बनून पूजा करतो. ही उत्तम पूजा नव्हे. ज्ञेयवस्तू म्हणजे बाहेरची वस्तू होय. यात आत्मज्ञान अनुपस्थित असते. द्वैताची दृष्टी उपस्थित असते. कारण हे ज्ञानरुपी आहे. ते म्हणजे बघणाराच ते चैतन्य आहे.

हे ज्ञान सर्वांना समजण्यायोग्य नाही असे ऋषीमुनींच्या ध्यानात आले. निरनिराळ्या स्तरातील लोकांकरिता निरनिराळ्या कहाण्या बनविल्या गेल्या. ही केवळ लोकांना समजावण्याची एक पद्धती ज्यायोगे प्रत्येकाचा काही फायदा होईल.

सर्वात प्रथम गणपतीची मूर्ती बनवितात. मग त्यामुर्तीची प्राणप्रतिष्ठापना करतात. म्हणजे, “माझे प्राण, माझा जीव यातील गणपती थोडाकाळ या मूर्तीमध्ये येऊन स्थापित होवो. म्हणजे मग आम्ही थोडा वेळ यांच्याबरोबर खेळू शकू, पूजा करू शकू.” पूजा तर एक खेळच आहे. पूजा म्हणजे आपल्या मनातील भाव व्यक्त करण्याची एक अद्भुत कला होय. एका भक्ताला देवाबरोबर खेळायची इच्छा आहे. भक्त कधी मागणी करत नाही. जर भक्ताने मागणी केली तर त्याची मागणी ही त्याच्या भक्तीपेक्षा मोठी होऊन जाते. म्हणूनच भक्ताला केवळ ईश्वरच हवा असतो, नाहीतर मग त्याला प्रभूबरोबर थोडेसे खेळायचे असते.

आपल्या आत असलेली ती निर्गुण निराकारअनंत शक्ती आहे त्या शक्तीला साकाररुपात खेळण्याकरिता आवाहन करतात ती गणपतीची पूजा होय. गणपतीची मूर्ती मातीने बनविली आणि मग म्हणतात, ‘गणपतीचे प्राण, माझे प्राण. त्याचा जीव, माझा जीव’. मग प्रार्थना करतात, “हे प्रभू, जो सदैव माझ्या आत असतो थोडा काळ या मूर्तीमध्ये येऊन स्थापित व्हावे. कारण माझी तुझ्याबरोबर खेळण्याची इच्छा आहे. जे तू माझ्याबरोबर केलेस, माझ्यावर मेहरबानी केलीस त्या सर्वाचे मी तुला प्रदर्शन करू इच्छितो.” ईश्वराने आपल्याला पाणी दिले आपण देवाला पाण्याचा अभिषेक करतो, देवाने आपल्याला फळे दिली तर आपण देवाला फळाचा नेवैद्य दाखवतो, फुले दिली तर आपण फुले वाहतो, सूर्य आणि चंद्राने देव नित्य आपली आरती करीत असतो त्याप्रमाणे आपणसुद्धा एक कापूर जाळून देवाला ओवाळून आरती करतो. याप्रकारे एक भक्त आपल्या आतील भाव व्यक्त करतो अशा प्रकारे पूजेचा विधी असतो. पूजा झाल्यानंतर भक्त म्हणतो, “हे ईश्वरा, आता पुन्हा माझ्या आतमध्ये स्थापित व्हावे.” यालाच विसर्जन असे म्हणतात. ‘विशेष प्रकारे पुन्हा सृजन करणे म्हणजेच विसर्जन होय.’

भक्त म्हणतो, “माझे हृदयकमल जिथून तू आगमन केलेस तिथे आता तू पुन्हा विराजमान व्हावेस.” जसे सणासुदीला दागिन्यांना तिजोरीतून काढून घालतात आणि मग पुन्हा त्यांना तिजोरीत ठेऊन देतात. त्याच प्रकारे एक अमूल्य ज्ञान, एक अमूल्य रत्न, एक अमूल्य तत्त्व जे आपल्या आत दडलेले आहे त्या चेतनेला एका खेळाच्या रूपाने जीवनात आनंदोत्सव साजरा करण्याची प्रक्रिया आहे हा गणेशोत्सव!

तर मग पूजा केल्यानंतर ती मूर्ती असते तिला घेऊन जाऊन विसर्जित करतात. हे तर चांगल्या प्रकारे माहिती असून की ईश्वर केवळ मूर्तीमध्येच नाहीतर तो सर्वव्यापी आहे आणि त्या सर्वव्यापीला साकाररुपात प्राप्त करून त्या साकाराचा सुद्धा आनंद घेण्याचा सण आहे गणेशोत्सव. अशाप्रकारच्या सणांमुळे जीवनात उत्साह आणि भक्ती स्फुरण पावते. नारदमुनी म्हणतात,

पुजाविश्व अनुराग इति पाराशरया

नारदभक्ती सूत्रामध्ये उल्लेख आहे की पराशर ऋषीनुसार, पूजेमध्ये आसक्ती ठेवणे, अनुराग ठेवणे हे भक्तीचे एक लक्षण आहे. म्हणून पूजा करा पण कोणत्या भयाने नाही किंवा कोणत्या लोभाने नाही तर प्रेमाने, भक्तीने करा. बाह्य पुजेपेक्षा मानसिक पूजा श्रेष्ठ आहे. मानसिक पूजेबद्दल आदि शंकराचार्य म्हणतात त्याप्रमाणे अद्वैत चैतन्य शक्तीलाच गणपती मानले. आणि ती गणपती शक्ती जगताचे कारणरुपी आहे.

जगत्कारणं कारणज्ञानरूपं सुरादिं सुखादिं गुणॆशं गणॆशं

समस्त खऱ्या सुखाची सुरुवात ही या चैतन्यापासून आहे. आपला प्रत्येक कण न कण जेव्हा चैतन्याने भरून जातो तेव्हा जो आनंद ओसंडून वाहू लागतो ती बाहेर दाखवण्यासारखी प्रसन्नता नाही. वरवरचे हसणे ते काही कामाचे नाही. पण ती आंतरिक प्रसन्नता आहे जी सर्व सुखाची सुरुवात आहे. आनंद, उत्साह, प्रेम आणि अशाप्रकारच्या सर्व सकारात्मक भावनांचे स्फुरण तिथूनच होते. सर्वगुणांचा सुद्धा तो स्वामी आहे. आपले आत्मचैतन्य हे गुणांचेसुद्धा अधिपती आहेत. सगळे चांगले गुण आपण हे अभ्यास करून आत्मसात करतो असे म्हंटले तर ते कधीच शक्य होणार नाही. आपल्याला असे मानून चालले पाहिजे की ते सर्व चांगले गुण आपल्यात आहेतच आणि जे दुर्गुण आहेत ते बाहेर आलेला मळ आहे. साधनेमुळे अवगुण नाहीसे होतात. गुण तर आधीपासून आहेतच ते अधिक उजळून निघतात. भगवान श्रीकृष्णाने सुद्धा दैवासुर संपत्तीभाग्ययोग मध्ये अर्जुनाला सांगितले, ‘हे अर्जुना, सगळेदैवी गुण तर तुझ्यात आधीपासून आहेतच.’ तर हे मानून चला की तुमच्यात सगळे दैवी गुण आहेत, आणि त्या गुणांचे अधिपती आहे गणपती जो लपून आहे. आता गणपतीची आराधना केल्याने सर्व सद्गुण विकसित व्हायला लागतात.

जगद्व्यापिनं विश्ववन्द्यं सुरेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम

संपूर्ण जग तुझ्या अस्तित्वाने व्यापलेले आहे. हे गणपती, प्रत्येकजण तुला पूजितो, जगाच्या प्रत्येक कानाकोपऱ्यात तुझ्यावर श्रद्धा ठेवणारे लोक आहेत. प्रत्येक देशात ईश्वराला निराकार म्हणून मानले जाते. गुणाचे दैवत म्हणून मानले जाते. अशाप्रकारे समस्त जगात तू वंदनीय आहेस. तू परब्रह्मच आहेस.

गुणातीतमानं चिदानंदरूपं । चिदाभासकं सर्वगं ध्यानगम्यं ।

मुनिध्यॆयमाकाशरूपं परॆशं । परब्रह्मरूपं गणॆशं भजॆम ॥३॥


सर्व गुणांच्या तू पलीकडे आहेस.


गणेशाचे स्वरूप कसे आहे? ते आहे सच्चिदानंद आहे. मस्ती आहे, आनंद आहे.

गुणातीतमानं चिदानंदरूपं चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम्

ते चैतन्य असेल तरच गणपतीची अनुभूती होऊ शकते. आपल्या स्व: मध्ये थोडी फार जरी जागृती झाली तर आपण त्याला ओळखू शकतो. जड बुद्धी असलेल्यांना तो ओळखू येत नाही.

चिदाभासकं सर्वगं ज्ञानगम्यम्

सर्वत्र तो व्याप्त आहे आणि तो केवळ ज्ञानानेच ओळखू येऊ शकते. अशा या महागणपतीला विद्येचा अधिपती म्हणून मानले जाते. कोणतीही पूजा असली तरी पहिला पूजेचा मान गणपतीचा असतो. म्हणजे गणेशतत्त्वाला सर्वप्रथम आपल्या आत जागृत करा. तमोगुणाला सोडून देऊन सत्त्वगुणाकडे जायचे आहे. हा पूजेचा प्रथम चरण आहे.

मुनिध्येयमाकाशरूपं परेशं

तुमचे खरे स्वरूप काय आहे? तर ऋषीमुनी जेव्हा ध्यान करतात तेव्हा त्यांच्या ध्यानचित्तामध्ये जे निरंजन निर्विकल्प आकाश आहे ते चिदाकाश तूच आहेस. तू वस्तू नाहीस, व्यक्ती नाहीस.तू चिन्मयता आहेस, चिदाकाशच आहेस असे आदि शंकराचार्य म्हणतात.

तुझे रुप काय आहे? ऋषीमुनी ज्याचे ध्यान धरतात तो आकाशरूपी तू आहेस, सर्वव्याप्तआहेस. हेच तुझे खरे रूप आहे.

परेशं परं ब्रह्मरूपं गणेशं भजेम

त्या परब्रह्मरुपी गणेशाला मी वारंवार पूजीन, भजीन आणि वारंवार वंदन करेन.

अशाप्रकारे मूर्तीला समोर ठेवा, प्रेमाने तिची पूजा करा आणि मग ध्यानस्थ व्हा. डोळे बंद करून आपल्या आत त्या गणेशतत्त्वाला अनुभवणे हेच पूजेचे रहस्य आहे. हे गणेश चतुर्थीच्या सणाचे फळ आहे ज्यामध्ये आपण आपल्या आत दडलेल्या चेतनेला जागृत करतो.

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राम से बड़ा राम का नाम क्यों ?

रामदरबार में हनुमानजी महाराज रामजी की सेवा में इतने तन्मय हो गये कि गुरू वशिष्ठ के आने का उनको ध्यान ही नहीं रहा।
सबने उठ कर उनका अभिवादन किया पर, हनुमानजी नही कर पाये।
वशिष्ठ जी ने रामजी से कहा कि -“राम, गुरु का भरे दरबार में अभिवादन नहीं कर अपमान करने पर क्या सजा होनी चाहिए ?”
राम ने कहा -गुरुवर, आप ही बतायें ।
वशिष्ठजी ने कहा – मृत्यु दण्ड ।
राम ने कहा – स्वीकार है

तब राम जी ने कहा कि गुरुदेव, आप बतायें कि यह अपराध किसने किया है?
बता दूंगा पर, राम !
वो तुम्हारा इतना प्रिय है कि, तुम अपने आप को सजा दे दोगे पर उसको नहीं दे पाओगे ।
राम ने कहा, गुरुदेव! राम के लिये सब समान हैं। मॆने सीता जेसी पत्नी का सहर्ष त्याग, धर्म के लिये कर दिया तो, भी आप संशय कर रहे हैं?
नहीं, राम! मुझे तुम्हारे पर संशय नहीं है पर, मुझे दण्ड के परिपूर्ण होने पर संशय है।
अत: यदि तुम यह विश्वास दिलाते हो कि, तुम स्वयं उसे मृत्यु दण्ड अपने अमोघ बाण से दोगे तो ही में अपराधी का नाम और अपराध बताऊँगा
राम ने पुन: अपना ससंकल्प व्यक्त कर दिया।

तब वशिष्ठ जी ने बताया कि, यह अपराध हनुमान जी ने किया हॆं।
हनुमानजी ने स्वीकार कर लिया।

तब दरबार में रामजी ने घोषणा की कि, कल सांयकाल सरयु के तट पर, हनुमानजी को मैँ स्वयं अपने अमोघ बाण से मृत्यु दण्ड दूंगा।
हनुमानजी के घर जाने पर उदासी की अवस्था में माता अंजनी ने देखा तो चकित रह गयी, कि मेरा लाल महावीर, अतुलित बल का स्वामी, ज्ञान का भण्डार, आज इस अवस्था में?
माता ने बार -बार पूछा, पर जब हनुमान चुप रहे तो माता ने अपने दूध का वास्ता देकर पूछा।
तब हनुमानजी ने बताया कि, यह प्रकरण हुआ है अनजाने में।
माता! आप जानती हैं कि, हनुमान को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में कोई नहीं मार सकता, पर भगवान राम के अमोघ बाण से भी कोई नहीं बच सकता l
तब माता ने कहा कि,
हनुमान, मैंने भगवान शंकर से, “राम” मंत्र (नाम) प्राप्त किया था ,और तुम्हे भी जन्म के साथ ही यह नाम घुट्टी में पिलाया।
जिसके प्रताप से तुमने बचपन में ही सूर्य को फल समझ मुख में ले लिया, उस राम नाम के होते हुये हनुमान कोई भी तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता ।
चाहे वो राम स्वयं ही क्यों न हो l
‘राम’ नाम की शक्ति के सामने राम की शक्ति और राम के अमोघ शक्तिबाण की शक्तियां महत्वहीन हो जायेगी।
जाओ मेरे लाल, अभी से सरयु के तट पर जाकर राम नाम का उच्चारण करना आरंभ कर दो।
माता के चरण छूकर हनुमानजी, सरयु किनारे राम राम राम राम रटने लगे।
सांयकाल, राम अपने सम्पूर्ण दरबार सहित सरयुतट आये।
सबको कोतुहल था कि, क्या राम हनुमान को सजा देगें?

पर जब राम ने बार- बार रामबाण ,अपने महान शक्तिधारी ,अमोघशक्ति बाण चलाये पर हनुमानजी के ऊपर उनका कोई असर नहीं हुआ तो, गुरु वशिष्ठ जी ने शंका बतायी कि, राम तुम अपनी पूर्ण निष्ठा से बाणों का प्रयोग कर रहे हो?
तो राम ने कहा हां गुरूदेव मैँ गुरु के प्रति अपराध की सजा देने को अपने बाण चला रहा हूं, उसमें किसी भी प्रकार की चतुराई करके मैँ कॆसे वही अपराध कर सकता हूं?
तो तुम्हारे बाण अपना कार्य क्यों नहीं कर रहे हॆ?
तब राम ने कहा, गुरु देव हनुमान राम राम राम की अंखण्ड रट लगाये हुये हॆं।
मेरी शक्तिंयो का अस्तित्व राम नाम के प्रताप के समक्ष महत्वहीन हो रहा है।
इसमें मेरा कोई भी प्रयास सफल नहीं हो रहा है।
आप ही बतायें , गुरु देव ! मैँ क्या करुं।

गुरु देव ने कहा, हे राम ! आज से मैँ तुम्हारा साथ तुम्हारा दरबार, त्याग कर अपने आश्रम जाकर राम नाम जप हेतु जा रहा हूं।
जाते -जाते, गुरुदेव वशिष्ठ जी ने घोषणा की कि हे राम ! मैं जानकर , मानकर. यह घोषणा कर रहा हूं कि स्वयं राम से, ‘राम’ का नाम बडा है, महा अमोघशक्ति का सागर है।
जो कोई जपेगा, लिखेगा, मनन करेगा, उसकी लोक कामनापूर्ति होते हुये भी,वो मोक्ष का भागी होगा।
मैंने सारे मंत्रों की शक्तियों को राम नाम के समक्ष न्युनतर माना है।

तभी से राम से बडा ‘राम’ का नाम माना जाता है ।
वो पत्थर भी तैर जाते है जिन पर लिखा रहता है राम नाम।

10 mystical facts about Lord Ganesha

The ancient rishis were so deeply intelligent that they chose to express Divinity in terms of symbols rather than words, since words change over time, but symbols remain unchanged. When we worship Lord Ganesha the qualities that he represent gets kindled within us.

Gana : Signifies the ultimate truth that this existing world is nothing but a collection of molecules. This is called as ‘Gana’ (collective form). Our own body is a ‘Gana’. It is made up of flesh, blood and bone marrow. Thus the Lord of all ‘Ganas’ is ‘GANESHA’.

Elephant-head: Signifies authority, endurance, strength and courage.

Mouse as a vehicle: Signifies the mouse nibbling away at ropes that bind. Just like a mantra which can cut through sheets and sheets of ignorance and carry even an elephant through.

Big Belly: Signifies generosity and total acceptance.

Single tusk: Signifies one-pointedness.

Upraised hand : Depicts protection.

Lowered hand : Signifies endless giving and and also symbolizes the fact that we will all dissolve into the earth one day.

Riddhi & Siddhi wives of Lord Ganesha: Signifies that both Riddhi (intelligence) and Siddhi(enhanced abilities) go together with wisdom. Lord Ganesha is considered to be the Lord of Wisdom.

Ankusha and noose: The Ankusha (the goad/stick that is used to prod an elephant awake) signifies ‘awakening’ and the ‘Paasa’ (the noose) which signifies control. Together they signify that with inner-awakening, a lot of energy is released which can go haywire without proper guidance (control) .

Modak: The ‘Modak’ in Ganesha’s hand is the attainment of the ‘Ultimate Bliss’.