भगवान श्री दत्तात्रेय

 

” श्री दत्तात्रेय ने सृष्टि में उपस्थित समस्त समष्टि से ज्ञान प्राप्त किया था। अत्रेय ऋषि की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने दत्ता को गोद ले लिया। दत्ता या दत्त का अर्थ होता है- दिया हुआ, पाया हुआ या अपनाया हुआ। इसीलिए जब कोई किसी बच्चे को गोद लेता है तो उसे “दत्त स्वीकरा” कहा जाता है। अतः जब आत्रेय और अनुसूया ने बच्चे को गोद लिया तो उसे “दत्तात्रेय” कहा गया।

त्रिशक्तियों का साथ होना “गुरु शक्ति” है!

इस बालक में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव, तीनों की ही शक्तियां विद्यमान थीं। सृजनशीलता अनेक लोगों में होती है, पर सभी लोग इसका सदुपयोग नहीं कर पाते। कुछ लोग आरंभ तो अच्छा कर देते हैं लेकिन उसे निरंतर बनाए नहीं रख सकते। सृजनशीलता ही “ब्रह्मा शक्ति” है। यदि हमारे भीतर ब्रह्मा शक्ति है, तो हम सृजन तो कर लेते हैं परन्तु ये नहीं जानते कि उसे कायम कैसे रखा जाए।

किसी काम या बात को बनाए रखना, कायम रखना “विष्णु शक्ति” है। हमें ऐसे अनेक लोग मिल जाते हैं जो अच्छे प्रबंधक या पालक होते हैं। वे सृजन नहीं कर सकते परन्तु यदि उन्हें कुछ सृजन कर के दे दिया जाए तो वे उसे अत्युत्तम ढंग से निभाते हैं। अतः व्यक्ति में विष्णु शक्ति अर्थात सृजित को बनाए रखने की शक्ति का होना भी अत्यंत आवश्यक है।

इसके बाद आती है ‘शिव शक्ति’ जो परिवर्तन या नवीनता लाने की शक्ति होती है। अनेक लोग ऐसे होते हैं जो चल रही किसी बात या काम को केवल कायम या बनाए रख सकते हैं परन्तु उन्हें ये नहीं पता होता है कि परिवर्तन कैसे लाया जाता है या इसमें नए स्तर तक कैसे पँहुचा जाए। इसलिए शिव शक्ति का होना भी आवश्यक है। इन तीनों शक्तियों का एक साथ होना “गुरु शक्ति” है। गुरु या मार्गदर्शक को इन तीनों शक्तियों का ज्ञान होना चाहिए।
दत्तात्रेय की भीतर ये तीनों शक्तियां विद्यमान थीं, इसका अर्थ ये हुआ कि वे गुरु शक्ति के प्रतीक थे। मार्गदर्शक, सृजनात्मकता, पालनकर्ता एवं परिवर्तनकर्ता सभी शक्तियां एक साथ! दत्तात्रेय ने हर एक चीज से सीखा। उन्होंने समस्त सृष्टि का अवलोकन किया और सबसे कुछ न कुछ ज्ञान अर्जित किया।

असंवेदनशील से संवेदनशीलता की राह पर चलें !

श्रीमद भागवत में उल्लिखित है कि “यह बहुत ही रोचक है कि उन्होंने कैसे एक हंस को देखा और उससे कुछ सीखा, उन्होंने कौवे को देख कर भी कुछ सीखा और इसी प्रकार एक वृद्ध महिला को देख कर भी उससे ज्ञान ग्रहण किया।”

उनके लिए चारों तरफ ज्ञान बह रहा था। उनकी बुद्धि और ह्रदय ज्ञानार्जन एवं तत्पश्चात उसे जीवन में उतारने के लिए सदैव उद्यत रहते थे। अवलोकन (प्रेक्षण) से ज्ञान आता है और अवलोकन या प्रेक्षण के लिए संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। यदि हम अपनी ही दुनिया में उलझ के रह गए हैं तो हम अपने आस-पास के लोगों से मिलने वाले संदेशों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं।

जब लोग अपनी बातों को ज्यादा महत्त्व देने लगते हैं तो दूसरों के दृष्टिकोण पर उनकी नज़र जाती ही नहीं है। और ऐसे लोग ये भी मानते हैं कि उनकी धारणा बिलकुल सही है जबकि हम जानते हैं कि वे सही नहीं हैं।”

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भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु

भगवान दत्तात्रेय का 24 गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करने का पौराणिक प्रसंग जीवन में गुरु की महत्ता को रोचक तरीके से उजागर करता है। क्योंकि ये 24 गुरुओं मात्र इंसान ही नहीं बल्कि पशु, पक्षी व कीट-पतंगे भी शामिल हैं।
  1. पृथ्वी- सहनशीलता व परोपकार की भावना।
  2. कबूतर – कबूतर का जोड़ा जाल में फंसे अपने बच्चों को देखकर मोहवश खुद भी जाल में जा फंसता है। सबक लिया कि किसी से भी ज्यादा स्नेह दुःख की वजह होता है।
  3. समुद्र- जीवन के उतार-चढ़ाव में खुश व संजीदा रहें।
  4. पतंगा- जिस तरह पतंगा आग की तरफ आकर्षित हो जल जाता है। उसी तरह रूप-रंग के आकर्षण व मोह में न उलझें।
  5. हाथी – आसक्ति से बचना।
  6. छत्ते से शहद निकालने वाला – कुछ भी इकट्ठा करके न रखें, ऐसा करना नुकसान की वजह बन सकता है।
  7. हिरण – उछल-कूद, संगीत, मौज-मस्ती में न खोएं।
  8. मछली – स्वाद के वशीभूत न रहें यानी इंद्रिय संयम।
  9. पिंगला वेश्या – पिंगला नाम की वैश्या से सबक लिया कि केवल पैसों की आस में न जीएं। क्योंकि पैसा पाने के लिए वह पुरुष की राह में दुखी हुई व उम्मीद छोड़ने पर चैन से नींद ली।
  10. कुरर पक्षी – चीजों को पास में रखने की सोच छोड़ना। यानी अकिंचन होना।
  11. बालक – चिंतामुक्त व प्रसन्न रहना।
  12. कुमारी कन्या – अकेला रह काम करना या आगे बढ़ना। धान कूटते हुए इस कन्या की चूड़ियां आवाज कर रही थी। बाहर मेहमान बैठे होने से उसने चूड़ियां तोड़ दोनों हाथों में बस एक-एक चूड़ी रखी और बिना शोर के धान कूट लिया।
  13. शरकृत या तीर बनाने वाला – अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना।
  14. सांप – एकाकी जीवन, एक ही जगह न बसें।
  15. मकड़ी – भगवान भी माया जाल रचते हैं और उसे मिटा देते हैं।
  16. भृंगी कीड़ा –अच्छी हो या बुरी, जहां जैसी सोच में मन लगाएंगे मन वैसा ही हो जाता है।
  17. सूर्य – जिस तरह एक ही होने पर भी अलग-अलग माध्यमों में सूरज अलग-अलग दिखाई देता है। आत्मा भी एक है पर कई रूपों में दिखाई देती है।
  18. वायु – अच्छी बुरी जगह पर जाने के बाद वायु का मूल रूप स्वच्छता ही है। उसी तरह अच्छे-बुरों के साथ करने पर भी अपनी अच्छाइयों को कायम रखें।
  19. आकाश – हर देश काल स्थिति में लगाव से दूर रहे।
  20. जल – पवित्र रहना।
  21. अग्नि – हर टेढ़ी-मेढ़े हालातों में ढल जाएं। जैसे अलग-अलग तरह की लकड़ियों के बीच आग एक जैसी लगती नजर आती है।
  22. चन्द्रमा – आत्मा लाभ-हानि से परे है। वैसे ही जैसे कला के घटन-बढ़ने से चंद्रमा की चमक व शीतलता वही रहती है।
  23. भौंरा या मधुमक्खी – भौरें से सीखा कि जहां भी सार्थक बात सीखने को मिले न छोड़ें।
  24. अजगर – संतोष, जो मिल जाए उसे स्वीकार कर लेना।

(संकलित)